Ghaziabad News: गाजियाबाद से दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है। यहां ऑनलाइन गेम की लत ने तीन नाबालिग सगी बहनों की जान ले ली। तीनों ने एक साथ सुसाइड कर लिया। इस खौफनाक घटना ने हर माता-पिता को सन्न कर दिया है। यह हादसा साबित करता है कि ऑनलाइन गेम बच्चों के लिए सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि जानलेवा नशा बन चुका है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मोबाइल स्क्रीन के पीछे का यह खेल बच्चों के दिमाग को खोखला कर रहा है।
मानसिक सेहत पर गहरा वार
दिल्ली की सीनियर साइकोलॉजिस्ट मोनिका शर्मा ने इस मुद्दे पर गंभीर राय दी है। उनके अनुसार, बहुत ज्यादा ऑनलाइन गेम खेलने से बच्चों की मेंटल हेल्थ पूरी तरह बिगड़ सकती है। बच्चे असली दुनिया और परिवार से कटने लगते हैं। लगातार गेम खेलने से उनके स्वभाव में चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ जाता है। नींद न आना और तनाव जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि बच्चे खेल में मिली हार को बर्दाश्त नहीं कर पाते और गलत कदम उठा लेते हैं।
क्यों लग रही है यह जानलेवा लत?
कोरोना काल के बाद बच्चों के हाथों में मोबाइल का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। ऑनलाइन गेम को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि बच्चे इसमें फंसते चले जाएं। इनमें मौजूद विजुअल्स और रिवॉर्ड्स बच्चों को अपनी ओर खींचते हैं। कम उम्र होने के कारण बच्चों में सही और गलत की समझ कम होती है। वे डिजिटल दुनिया के जाल में आसानी से फंस जाते हैं। उन्हें पता ही नहीं चलता कि यह टाइमपास कब उनकी जिंदगी पर भारी पड़ने लगता है।
इन संकेतों को न करें नजरअंदाज
माता-पिता को अपने बच्चों के व्यवहार पर पैनी नजर रखनी चाहिए। अगर ऑनलाइन गेम खेलने से रोकने पर बच्चा आक्रामक हो जाए, तो सावधान हो जाएं। आंखों के नीचे काले घेरे, वजन बढ़ना और नींद न आना भी खतरे के संकेत हैं। अगर बच्चा पढ़ाई से जी चुराने लगे या दोस्तों से मिलना बंद कर दे, तो यह लत की निशानी है। बात-बात पर रोना या जिंदगी खत्म करने की बातें करना डिप्रेशन का गंभीर लक्षण हो सकता है।
माता-पिता के लिए जरूरी सलाह
एक्सपर्ट्स का कहना है कि डांट-डपट या मारपीट से यह लत नहीं छूटेगी। सख्ती दिखाने पर बच्चे बागी हो सकते हैं। इसलिए उनसे प्यार से बात करें और ऑनलाइन गेम के खतरों के बारे में समझाएं। मोबाइल का टाइम फिक्स करें। उन्हें घर से बाहर जाकर खेलने के लिए प्रेरित करें। अगर आपको बच्चे के व्यवहार में ज्यादा बदलाव दिखे, तो बिना देर किए किसी अच्छे मनोवैज्ञानिक की मदद लें।
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