New Delhi News: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच देश में ईंधन की आपूर्ति को लेकर बहस छिड़ गई है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा आवश्यक वस्तु अधिनियम (1955) लागू करने के बाद "ग्रेट गैस रीजिग" चर्चा का केंद्र बन गया है। युद्ध जैसी स्थितियों में पारंपरिक लाल सिलेंडर (LPG) और आधुनिक पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) के बीच सुरक्षा और उपलब्धता का बड़ा अंतर सामने आया है। केंद्र सरकार ने दोनों को प्राथमिकता दी है, लेकिन संकट के समय इनकी डिलीवरी प्रणाली अलग-अलग परिणाम देती है।
PNG नेटवर्क के अदृश्य फायदे
पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) का सबसे बड़ा लाभ इसकी निर्बाध सप्लाई चेन है। LPG के विपरीत, PNG के लिए ट्रकों या डिलीवरी एजेंटों की आवश्यकता नहीं होती। यह जमीन के नीचे बिछे नेटवर्क के जरिए सीधे घरों तक पहुंचती है। फिलहाल सिलेंडर यूजर्स पैनिक-बाइंग और "25-दिन के बुकिंग नियम" से जूझ रहे हैं। वहीं, PNG उपभोक्ताओं को उनके औसत उपभोग के आधार पर 100% नियमित गैस मिल रही है। इसमें सड़क यातायात या लॉजिस्टिक रुकावटों का कोई असर नहीं पड़ता।
LPG की तुलना में PNG क्यों है ज्यादा सुरक्षित?
सुरक्षा के लिहाज से भी PNG काफी बेहतर मानी जाती है। प्राकृतिक गैस हवा से हल्की होती है, इसलिए लीक होने पर यह तेजी से ऊपर उठकर फैल जाती है। इसके विपरीत, LPG हवा से भारी होने के कारण फर्श पर जमा हो जाती है, जिससे आग लगने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, PNG का प्रेशर बहुत कम (21 mbar) होता है। सिलेंडर में गैस अत्यधिक संकुचित और तरल रूप में होती है, जो आपात स्थिति में ज्यादा जोखिम पैदा कर सकती है।
घरेलू गैस आपूर्ति पर सरकार का रुख
प्राकृतिक गैस आदेश 2026 के तहत सरकार ने स्पष्ट किया है कि घरेलू किचन की प्राथमिकता सबसे ऊपर रहेगी। भारत अपनी आवश्यकता की लगभग 50% प्राकृतिक गैस (95 मिलियन मानक क्यूबिक मीटर प्रतिदिन) का उत्पादन खुद करता है। इस गैस का मुख्य हिस्सा PNG नेटवर्क और बिजली क्षेत्र को दिया जाता है। संकट के समय में स्वदेशी उत्पादन पर निर्भरता PNG को एक अधिक विश्वसनीय और स्थिर विकल्प बनाती है।
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