सफेद चावल की कमियां और नया समाधान
भारत में सफेद चावल सबसे ज्यादा खाया जाता है। इसमें स्टार्च की मात्रा बहुत अधिक होती है, लेकिन प्रोटीन और फाइबर काफी कम होता है। यही कारण है कि देश में डायबिटीज के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। वैज्ञानिकों द्वारा तैयार इस नए चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) 55 से भी कम है। इससे खाने के बाद शरीर में ब्लड शुगर का स्तर अचानक नहीं बढ़ता है। सामान्य चावल में सिर्फ 6-8% प्रोटीन होता है, जबकि इस नए चावल में 20% से ज्यादा प्रोटीन है।
प्रोटीन की कमी का प्रभावी इलाज
देश की लगभग 70 से 80 प्रतिशत आबादी प्रोटीन की कमी से जूझ रही है। लोग भोजन के लिए मुख्य रूप से चावल और गेहूं पर निर्भर हैं। महंगी दालें और डेयरी उत्पाद हर किसी की पहुंच में नहीं हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह हाई-प्रोटीन चावल इस खाई को पाटने का काम करेगा। इससे मध्यम और गरीब वर्ग के लोगों को सही पोषण के लिए महंगे विदेशी अनाजों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
बिना जेनेटिक बदलाव के ऐसे बना चावल
इस चावल को 'फूड आर्किटेक्चर' तकनीक से बनाया गया है। डॉ. सी आनंदरामकृष्णन के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने टूटे हुए चावलों का उपयोग किया है। इन टूटे चावलों को पीसकर उनमें प्रोटीन, आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 मिलाया गया है। सबसे खास बात यह है कि इसमें कोई जेनेटिक मॉडिफिकेशन (GM) नहीं किया गया है। इसे दोबारा प्रोसेस करके सामान्य चावल जैसा आकार और स्वाद दिया गया है।
युवाओं में बढ़ते डायबिटीज पर लगेगी लगाम
भारत में टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों की संख्या 77 से 90 मिलियन के बीच पहुंच गई है। शहरीकरण और खराब जीवनशैली के कारण युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। क्लिनिकल न्यूट्रिशनिस्ट निधि रस्तोगी के अनुसार, पोषण की गुणवत्ता बढ़ाकर इस खतरे को कम किया जा सकता है। यह डिजाइनर चावल सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार लाएगा।
जल्द पहुंचेगा आपकी रसोई तक
इस तकनीक को व्यावसायिक रूप से बाजार में उतारने की जिम्मेदारी 'टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स' को दी गई है। यह पहल न केवल स्वास्थ्य के लिए बेहतर है, बल्कि कृषि क्षेत्र में बर्बादी रोकने में भी मदद करेगी। टूटे हुए चावलों का सही इस्तेमाल होने से किसानों को भी लाभ होगा। केरल की लैब का यह आविष्कार जल्द ही हर भारतीय घर का हिस्सा बनने वाला है।
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